दक्षिण एशियाके भू-राजनीतिक संतुलनमें पाकिस्तानकी आंतरिक चुनौतियाँ

अनिल तिवारी  /  दक्षिण एशिया के सामरिक एवं भू-राजनीतिक संतुलन में पाकिस्तान का स्थान अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र, चीन के साथ रणनीतिक साझेदारी, अफगानिस्तान के साथ खुली सीमा, भारत के साथ दशकों पुरानी प्रतिस्पर्धा तथा इस्लामी विश्व से उसके घनिष्ठ संबंधों के कारण पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति केवल घरेलू राजनीति का विषय नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुकी है।

 

हालाँकि पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। सात दशकों से अधिक के राजनीतिक इतिहास में लोकतंत्र, सैन्य शासन, न्यायपालिका, सुरक्षा संस्थानों और राजनीतिक दलों के बीच शक्ति संघर्ष ने राज्य की संस्थाओं को कमजोर किया है। परिणामस्वरूप पाकिस्तान बार-बार मजबूत लोकतांत्रिक संस्थागत विकास का अवसर खोता रहा है।

आज पाकिस्तान एक साथ राजनीतिक ध्रुवीकरण, आर्थिक संकट, सुरक्षा चुनौतियों, जातीय विद्रोह और संस्थागत अविश्वास जैसी अनेक समस्याओं का सामना कर रहा है। इन सभी मुद्दों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि एक ही संरचनात्मक संकट के विभिन्न आयामों के रूप में समझना आवश्यक है।

1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद पाकिस्तान को प्रारंभ से ही कमजोर राजनीतिक संस्थाओं की चुनौती का सामना करना पड़ा। कश्मीर विवाद, सुरक्षा संबंधी चिंताओं, कमजोर राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक अस्थिरता के कारण सेना धीरे-धीरे देश की सबसे प्रभावशाली संस्था बन गई।

1958 में पहले सैन्य तख्तापलट के बाद सेना केवल सुरक्षा संस्था नहीं रही, बल्कि नीति निर्माण, विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया की निर्णायक शक्ति बन गई। परिणामस्वरूप अयूब खान, याह्या खान, जिया-उल-हक और परवेज मुशर्रफ जैसे सैन्य शासकों ने प्रत्यक्ष शासन किया।

यद्यपि 2008 के बाद प्रत्यक्ष सैन्य शासन समाप्त हो गया, लेकिन सेना का प्रभाव समाप्त नहीं हुआ। इसके बाद पाकिस्तान में नियमित चुनाव होते रहे, किंतु “हाइब्रिड लोकतंत्र” अर्थात निर्वाचित सरकार और गैर-निर्वाचित शक्ति केंद्रों की संयुक्त व्यवस्था जारी रही। संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री और संसद सर्वोच्च हैं, फिर भी राष्ट्रीय सुरक्षा, भारत नीति, अफगानिस्तान नीति, परमाणु कार्यक्रम तथा अन्य रणनीतिक निर्णयों में सेना का प्रभाव लगातार दिखाई देता है।

राजनीतिक दलों की चुनौतियाँ

पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी जैसे प्रमुख दल लंबे समय से परिवार-आधारित नेतृत्व पर निर्भर रहे हैं। इन दलों पर विचारधारा और आंतरिक लोकतंत्र की अपेक्षा व्यक्तिपूजा तथा गुटबाजी को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं।

सरकार बदलते ही प्रशासनिक ढाँचे में व्यापक परिवर्तन, राजनीतिक प्रतिशोध तथा दीर्घकालिक सुधारों की बजाय अल्पकालिक राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति ने संस्थागत विकास को कमजोर किया है।

इसी कारण सेना स्वयं को “स्थिरता की गारंटी” के रूप में प्रस्तुत करने में सफल रही है। कई जनमत सर्वेक्षणों में यह सामने आया है कि बड़ी संख्या में नागरिक राजनीतिक दलों की तुलना में सेना पर अधिक विश्वास करते हैं। हालांकि इससे लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर होने का खतरा भी बढ़ता है।

पंजाब प्रांत की 20 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव से पहले अधिकांश विश्लेषकों का अनुमान था कि पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) की सरकार अगस्त 2023 तक अपना कार्यकाल पूरा करेगी।

लेकिन 17 जुलाई 2022 को हुए उपचुनावों में इमरान खान के नेतृत्व वाली पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने अप्रत्याशित जीत दर्ज की। इसके बाद राजनीतिक माहौल तेजी से इमरान खान के पक्ष में जाता दिखाई दिया। गठबंधन सरकार का भविष्य अनिश्चित लगने लगा और मध्यावधि चुनाव की संभावना पर चर्चा शुरू हो गई।

हालाँकि 2 अगस्त 2022 को पाकिस्तान निर्वाचन आयोग (ECP) ने पीटीआई के विदेशी फंडिंग मामले में अपना बहुप्रतीक्षित निर्णय सुनाया। इस निर्णय ने न केवल पीटीआई बल्कि स्वयं इमरान खान को भी कानूनी विवादों में घेर लिया। इससे उनकी भ्रष्टाचार-विरोधी और ईमानदार नेता की छवि को बड़ा झटका लगा।

विपक्षी दलों ने इस अवसर का उपयोग करते हुए उनके विरुद्ध कानूनी और राजनीतिक अभियान तेज कर दिया। परिणामस्वरूप समय से पहले चुनाव कराने की इमरान खान की मुहिम कमजोर पड़ गई और गठबंधन सरकार के कार्यकाल पूरा करने की संभावना मजबूत होती गई।

इमरान खान बनाम पाकिस्तानी सेना

सत्ता से हटने के बाद इमरान खान ने अपनी हार को सामान्य संसदीय प्रक्रिया मानने से इनकार किया। उन्होंने दावा किया कि उनके खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव विदेशी शक्तियों और उनके स्थानीय सहयोगियों की साजिश था। उनके आरोपों का निशाना केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सेना भी बनी।

उन्होंने सेना की कथित “तटस्थता” की आलोचना करते हुए कहा कि “तटस्थ तो केवल जानवर होते हैं।” इसके बाद उन्होंने सेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की तुलना इतिहास के विवादास्पद पात्र मीर जाफर और मीर सादिक से की, जिन्हें विश्वासघात का प्रतीक माना जाता है।

2021 में आईएसआई प्रमुख की नियुक्ति को लेकर सरकार और सेना के बीच मतभेद सार्वजनिक हो गए। यह घटना पाकिस्तान में वास्तविक सत्ता के केंद्र को लेकर नई बहस का कारण बनी। अंततः अप्रैल 2022 में संसद में अविश्वास प्रस्ताव पारित हुआ और इमरान खान प्रधानमंत्री पद से हट गए।

शहबाज शरीफ के नेतृत्व में नई गठबंधन सरकार बनने के बाद उम्मीद थी कि राजनीतिक तनाव कम होगा और आर्थिक सुधारों पर ध्यान दिया जाएगा। लेकिन स्थिति इसके विपरीत रही।

इमरान खान ने देशव्यापी आंदोलन शुरू कर दिया, जबकि सरकार आर्थिक संकट और आंतरिक मतभेदों से जूझती रही। विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घटा, महँगाई ऐतिहासिक स्तर पर पहुँची, ऊर्जा संकट गहराया और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ कठोर आर्थिक समझौते करने पड़े ।

राजनीतिक अस्थिरता के कारण दीर्घकालिक आर्थिक सुधार और भी कठिन हो गए।राजनीतिक अस्थिरता के साथ आर्थिक संकट ने सुरक्षा चुनौतियों को और जटिल बना दिया है। पाकिस्तान विदेशी मुद्रा संकट, बढ़ते सार्वजनिक ऋण, ऊँची महँगाई, ऊर्जा संकट, बेरोजगारी और विकास व्यय में कटौती जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देशों में सामाजिक असंतोष, उग्रवाद और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ने की संभावना अधिक होती है।

पाकिस्तान का अनुभव यह दर्शाता है कि केवल चुनाव कराना लोकतंत्र की सफलता का प्रमाण नहीं है। जब राजनीतिक दल स्वयं लोकतांत्रिक नहीं होते, न्यायपालिका राजनीतिक विवादों में उलझ जाती है, सुरक्षा संस्थान राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, मीडिया स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर पाता और नागरिक संस्थाएँ कमजोर होती हैं, तब लोकतंत्र का संस्थागत विकास अवरुद्ध हो जाता है।

इसका प्रभाव केवल इस्लामाबाद की राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक विश्वास और पूरे दक्षिण एशिया की रणनीतिक स्थिरता पर भी पड़ता है।

बलूचिस्तान : पाकिस्तान की सबसे जटिल चुनौती

क्षेत्रफल की दृष्टि से बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है। प्राकृतिक गैस, तांबा, सोना और अन्य खनिज संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद यह देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता है।

स्थानीय समुदाय लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि उन्हें प्राकृतिक संसाधनों का उचित लाभ नहीं मिलता, विकास में भेदभाव होता है और राजनीतिक प्रतिनिधित्व सीमित है। यही असंतोष समय-समय पर सशस्त्र विद्रोह के रूप में सामने आया है।

बलूच राष्ट्रवादी संगठन अधिक स्वायत्तता या स्वतंत्रता की माँग करते हैं, जबकि पाकिस्तान सरकार उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानती है। हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों, पुलिस चौकियों, सरकारी प्रतिष्ठानों और बुनियादी ढाँचे पर हुए हमलों ने सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी है।

हालाँकि इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरा बलूचिस्तान सरकारी नियंत्रण से बाहर है। विभिन्न क्षेत्रों की सुरक्षा स्थिति अलग-अलग है और समय के साथ बदलती रहती है।

पाकिस्तान की एक अन्य बड़ी सुरक्षा चुनौती तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) है। 2014 में पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए भीषण आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान ने व्यापक सैन्य अभियान चलाया था । कुछ वर्षों तक TTP कमजोर दिखाई दी, लेकिन अफगानिस्तान में तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद उसकी गतिविधियों में फिर वृद्धि देखी गई । पाकिस्तान का आरोप है कि TTP के कुछ लड़ाके अफगानिस्तान की भूमि से संचालित होते हैं, जबकि अफगान तालिबान सरकार इस आरोप से इनकार करती है। इस मुद्दे ने दोनों देशों के संबंधों को और जटिल बना दिया है।

मानवाधिकार और सुरक्षा

सुरक्षा चुनौतियों के साथ मानवाधिकार का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने विशेष रूप से बलूचिस्तान में जबरन लापता किए गए लोगों, न्यायेतर हत्याओं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध तथा नागरिक अधिकारों को लेकर चिंता व्यक्त की है। दूसरी ओर पाकिस्तान सरकार का कहना है कि आतंकवाद के विरुद्ध सभी कार्रवाई संविधान और कानून के अनुसार की जाती है तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।

इस प्रकार पाकिस्तान की सुरक्षा बहस केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकार, संघीय शासन, विकास और राजनीतिक समावेशन से भी जुड़ी हुई है।

चीन, अमेरिका और भू-राजनीति

पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति को केवल घरेलू राजनीति से नहीं समझा जा सकता। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC), अफगानिस्तान की स्थिति, अमेरिका के साथ संबंध, खाड़ी देशों की आर्थिक सहायता तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पर निर्भरता—ये सभी कारक पाकिस्तान की राजनीति और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं।

चीन के लिए पाकिस्तान हिंद महासागर तक रणनीतिक पहुँच का माध्यम है, जबकि अमेरिका के लिए वह आतंकवाद-रोधी अभियानों और क्षेत्रीय स्थिरता के संदर्भ में महत्वपूर्ण साझेदार रहा है। बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन के बीच पाकिस्तान के सामने संतुलित विदेश नीति बनाए रखने की चुनौती और भी बढ़ गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा समस्याओं का स्थायी समाधान केवल सैन्य कार्रवाई से संभव नहीं है। जहाँ राजनीतिक उपेक्षा, आर्थिक असमानता, स्थानीय शासन की कमजोरी, विकास की कमी और नागरिक अधिकारों की अनदेखी होती है, वहाँ सुरक्षा संकट बार-बार उभरते हैं।

इसलिए बलूचिस्तान तथा अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में राजनीतिक संवाद, समावेशी विकास, स्थानीय भागीदारी और संस्थागत सुधार को समान महत्व देना आवश्यक है।

पाकिस्तान केवल आतंकवाद से संघर्ष कर रहा देश नहीं है; वह अपने राज्य ढाँचे, लोकतांत्रिक संस्थाओं, आर्थिक क्षमता और राष्ट्रीय एकता की भी परीक्षा से गुजर रहा है । यदि राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और सुरक्षा चुनौतियों का समाधान संस्थागत सुधार, आर्थिक पुनर्निर्माण और व्यापक राजनीतिक सहमति के माध्यम से नहीं किया गया, तो अस्थिरता और गहरी हो सकती है।

पिछले सात दशकों का अनुभव बताता है कि केवल सरकार बदलने से संरचनात्मक समस्याओं का समाधान नहीं होता। जब तक राज्य की प्रमुख संस्थाओं के बीच अधिकारों का स्पष्ट विभाजन, कानूनी जवाबदेही और लोकतांत्रिक संतुलन स्थापित नहीं होगा, तब तक राजनीतिक संकट दोहराए जाने की संभावना बनी रहेगी।

प्रभावी लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका, जवाबदेह सरकार, स्वतंत्र मीडिया, सक्रिय नागरिक समाज और संविधान का निष्पक्ष पालन आवश्यक है। इसी प्रकार आर्थिक सुधार, कर व्यवस्था में सुधार, निर्यात वृद्धि, ऊर्जा क्षेत्र का पुनर्गठन, शिक्षा, तकनीकी कौशल विकास और सुशासन भी पाकिस्तान के दीर्घकालिक विकास के लिए अनिवार्य हैं।

पाकिस्तान आज अपने इतिहास के सबसे जटिल दौरों में से एक से गुजर रहा है। फिर भी इतिहास यह भी बताता है कि गंभीर संकटों से संस्थागत सुधार, राजनीतिक सहमति और आर्थिक पुनर्निर्माण के माध्यम से बाहर निकला जा सकता है।

इसलिए पाकिस्तान का भविष्य केवल सैन्य शक्ति या अल्पकालिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती, कानून के शासन, आर्थिक परिवर्तन, प्रांतीय समावेशन और राष्ट्रीय सहमति पर निर्भर करेगा । क्षिण एशिया की शांति और समृद्धि के लिए भी एक स्थिर, उत्तरदायी और लोकतांत्रिक पाकिस्तान सभी देशों के साझा हित में है।

आने वाले वर्षों में पाकिस्तान द्वारा लिए जाने वाले राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी निर्णय केवल उसके अपने भविष्य को ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के सामरिक एवं भू-राजनीतिक संतुलन को भी प्रभावित करेंगे।

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